ॐ जय जगदीश हरे आरती: संपूर्ण पाठ, अर्थ, इतिहास और महत्व

Abhishek Jain
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🙏 ॐ जय जगदीश हरे आरती | संपूर्ण पाठ, इतिहास और महत्व 🙏

भगवान विष्णु की ॐ जय जगदीश हरे आरती

ॐ जय जगदीश हरे आरती भगवान विष्णु की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय आरतियों में से एक है। यह आरती भक्त और भगवान के गहरे रिश्ते को दर्शाती है, जहाँ भक्त अपने जीवन के सभी दुखों और संकटों के निवारण के लिए ईश्वर की शरण में जाता है। हर शुभ कार्य और पूजा के बाद इस दिव्य आरती का गायन किया जाता है।

📜 ॐ जय जगदीश हरे आरती का संक्षिप्त इतिहास

यह प्रसिद्ध आरती **श्रद्धा राम फिल्लौरी** द्वारा 19वीं शताब्दी में लिखी गई थी। मूल रूप से यह पंजाबी भाषा में थी, लेकिन इसकी लोकप्रियता के कारण इसे हिंदी और अन्य भाषाओं में अपनाया गया। हालाँकि, आरती के अंतिम पद में **'कहत शिवानन्द स्वामी'** का उल्लेख है, जो बाद में किसी कवि द्वारा जोड़ा गया माना जाता है, या हो सकता है कि श्रद्धा राम फिल्लौरी का ही एक उपनाम हो। इसका उपयोग लगभग सभी प्रमुख हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में, विशेषकर सत्यनारायण पूजा में किया जाता है।

ॐ जय जगदीश हरे आरती का महत्व और लाभ

  • मन को **असीम शांति** और सकारात्मकता मिलती है।
  • यह धन-धान्य और सुख-समृद्धि को आकर्षित करती है।
  • जीवन में आने वाले **संकट और बाधाएं** दूर होती हैं।
  • आत्मा शुद्ध होती है और **श्रद्धा-भक्ति** बढ़ती है।

📖 ॐ जय जगदीश हरे - संपूर्ण आरती पाठ (Center Aligned)

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।

स्वामी दुःख विनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।

स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।

तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।

स्वामी तुम अन्तर्यामी।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।

स्वामी तुम पालन-कर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

स्वामी सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

स्वामी तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

स्वमी पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।

स्वामी जो कोई नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

ॐ जय जगदीश हरे आरती का पदवार सरल अर्थ

पद 1-3: भगवान की शरण

पहले तीन पद भगवान को माता-पिता और एकमात्र आश्रय बताते हैं, जो **संकटों को दूर** करते हैं और सुख-समृद्धि देते हैं।

पद 4-6: परमात्मा का स्वरूप

इन पदों में भगवान को **पूर्ण परमात्मा, अन्तर्यामी, अगोचर** और करुणा का सागर बताया गया है, जिनसे भक्त मिलने की इच्छा व्यक्त करता है।

पद 7-9: प्रार्थना और फल

अंतिम पदों में भक्त दीनबन्धु से **विषय-विकार और पाप** मिटाने की प्रार्थना करता है, और अंत में फल बताया गया है कि जो यह आरती गाता है, वह **सुख-संपत्ति** प्राप्त करता है।

❓ ॐ जय जगदीश हरे आरती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q: ॐ जय जगदीश हरे आरती किसकी है?

A: यह आरती **भगवान विष्णु (जगदीश)** को समर्पित है, जो सृष्टि के पालनकर्ता हैं।

Q: इस आरती के लेखक कौन हैं?

A: इस आरती की रचना 19वीं शताब्दी में **श्रद्धा राम फिल्लौरी** द्वारा की गई थी।

Q: यह आरती कब गानी चाहिए?

A: यह आरती विशेष रूप से **सत्यनारायण पूजा** के अंत में और **दैनिक पूजा** के समापन पर गाई जाती है।

" जय श्री विष्णु "

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" जय श्री हरी "

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